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स्टूडेंट सुसाइड केस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त,कैसे कम हों खुदकुशी के मामले? SC ने जारी की गाइडलाइन

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छात्र-छात्राओं के आत्महत्याएं रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग के लिए जारी की नई गाइडलाइन

नई दिल्ली (समाधान न्यूज़ नेटवर्क)। देश में बढ़ती छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं के मामलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देशभर के स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटी और कोचिंग सेंटरों के लिए नए और सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन आत्महत्याओं को शिक्षा विभाग की असफलता करार दिया है और कहा है कि ये दिशानिर्देश पूरे देश में लागू होंगे।

शिक्षा व्यवस्था की खामी : सुप्रीम कोर्ट                जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस अहम मामले पर फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं को अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 32 (मौलिक अधिकारों की रक्षा) और 141 (सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का पूरे देश में लागू होना) में मिले अधिकारों के आधार पर सुनाया गया है। कोर्ट का यह आदेश, औपचारिक कानून बनने तक देश का कानून माना जाएगा।                                 यह महत्वपूर्ण कदम विशाखापत्तनम में आकाश बायजूस इंस्टीट्यूट में NEET की तैयारी कर रही एक 17 वर्षीय छात्रा की आत्महत्या के बाद उठाया गया है। जुलाई 2023 में हुई इस घटना के बाद छात्रा के पिता ने कोर्ट में याचिका दायर की थी।

क्यों ज़रूरी था यह कदम?

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, साल 2022 में भारत में कुल 1,70,924 आत्महत्याएं हुईं, जिनमें से 7.6% छात्र थे। यानी करीब 13,044 छात्रों ने खुदकुशी की थी, जिनमें से 2,200 से ज्यादा छात्रों ने परीक्षा में फेल होने के बाद अपनी जान ले ली। सुप्रीम कोर्ट ने इसे शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी कमी बताया है।

सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइन क्या है?

छात्रों को मानसिक रूप से मजबूत बनाने और आत्महत्याएं रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम दिशानिर्देश दिए हैं : मानसिक स्वास्थ्य नीति बनाएं : हर स्कूल, कॉलेज और कोचिंग सेंटर को UMMEED गाइडलाइंस, मनोदर्पण पहल और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति के आधार पर एक मानसिक स्वास्थ्य नीति बनानी होगी. इस नीति को हर साल अपडेट करना होगा और इसे संस्थान की वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर सबके लिए उपलब्ध कराना होगा.

काउंसलर रखें : जिन संस्थानों में 100 या ज्यादा छात्र पढ़ते हैं.उन्हें कम से कम एक काउंसलर, मनोवैज्ञानिक या सोशल वर्कर रखना होगा जो बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्‍यान रखेंगे. छोटे संस्थानों को बाहरी मानसिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञों के साथ टाई-अप करना होगा.

न हो ज्‍यादा छात्र : संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि एक काउंसलर के पास ज्यादा छात्र न हों. छोटे समूहों में काउंसलर को सौंपा जाएगा जो खासकर परीक्षा या नए सेमेस्टर के समय छात्रों को गोपनीय और दोस्ताना सपोर्ट दें.
बैच बांटने से बचें : कोचिंग सेंटरों को छात्रों को उनके अकादमिक प्रदर्शन,पब्लिक शेमिंग या बहुत मुश्किल टारगेट्स के आधार पर बैच में बांटने से बचना होगा ताकि बच्‍चों पर अनावश्यक दबाव न पड़े.
हेल्पलाइन और रेफरल सिस्टम : हर संस्थान को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, स्थानीय अस्पतालों, और आत्महत्या रोकथाम हेल्पलाइन के लिए लिखित नियम बनाने होंगे.जैसे हेल्पलाइन नंबर हॉस्टल, क्लासरूम और वेबसाइट पर बड़े और साफ अक्षरों में दिखने चाहिए.
कर्मचारियों का प्रशिक्षण : सभी शिक्षकों और गैर-शिक्षण स्टाफ को साल में कम से कम दो बार ट्रेनिंग लेनी होगी. यह ट्रेनिंग मानसिक स्वास्थ्य प्राथमिक चिकित्सा, तनाव के संकेत पहचानने,आत्म-नुकसान की स्थिति में मदद और रेफरल सिस्टम पर होगी.
संवेदनशील व्यवहार : सभी स्टाफ को SC, ST, OBC, EWS, LGBTQ+, विकलांग, अनाथ, या ट्रॉमा से गुजर चुके छात्रों के साथ संवेदनशील और बिना भेदभाव के व्यवहार करने की ट्रेनिंग दी जाएगी.
शिकायतों के लिए सिस्टम : रैगिंग, यौन उत्पीड़न या बुलिंग की शिकायतों के लिए गोपनीय और तेज सिस्टम बनाना होगा. एक आंतरिक समिति तुरंत एक्शन लेगी और पीड़ितों को मानसिक सपोर्ट देगी. शिकायत करने वालों के खिलाफ कोई बदले की कार्रवाई नहीं होगी.
आत्म हत्‍या की जवाबदेही : अगर कोई संस्थान शिकायतों पर समय पर एक्शन नहीं लेता और इससे कोई छात्र आत्म-नुकसान या आत्महत्या करता है तो संस्थान को जिम्मेदार ठहराया जाएगा. ऐसे में कानूनी और नियामक कार्यवाही होगी.
माता-पिता को जागरूक करें : संस्थानों को माता-पिता के लिए नियमित जागरूकता प्रोग्राम (ऑनलाइन या ऑफलाइन) चलाने होंगे. इनमें उन्हें बच्चों पर ज्यादा दबाव न डालने, तनाव के संकेत पहचानने और सहानुभूति से सपोर्ट करने की सलाह दी जाएगी.
मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा : मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक नियंत्रण और जीवन कौशल की पढ़ाई को स्टूडेंट ओरिएंटेशन और को-करिकुलर एक्टिविटीज में शामिल करना होगा.
रिपोर्टिंग अनिवार्य : हर संस्थान को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गतिविधियों जैसे काउंसलिंग, रेफरल, ट्रेनिंग की सालाना रिपोर्ट बनानी होगी और इसे UGC, AICTE, CBSE या राज्य शिक्षा विभाग को जमा करना होगा.
एक्सट्रा–करिकुलर पर जोर : खेल, कला और पर्सनैलिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम्स को बढ़ावा देना होगा. परीक्षा पैटर्न की समय-समय पर समीक्षा होगी ताकि पढ़ाई का बोझ कम हो और छात्रों में आत्मविश्वास बढ़े.
कैरियर काउंसलिंग : सभी संस्थानों को छात्रों और उनके माता-पिता के लिए नियमित कैरियर काउंसलिंग करनी होगी. यह काउंसलिंग दबाव कम करेगी और अलग-अलग कैरियर ऑप्शन्स बताएगी.जिससे स्‍टूडेंट को रुचि के आधार पर फैसले लेने में मदद मिलेगी.
सुरक्षित माहौल और उपाय : हॉस्टल्स में पंखे और छत,बालकनी जैसे क्षेत्रों में छात्रों की पहुंच सीमित करनी होगी. कैंपस को बुलिंग, ड्रग्स और उत्पीड़न से मुक्त रखना होगा ताकि छात्रों के लिए सुरक्षित माहौल बन सके.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि परीक्षा के दबाव को कम करने के लिए स्कूल-कोचिंग को खेल और कला को बढ़ावा देना चाहिए और कैरियर काउंसलिंग पर जोर देना चाहिए। कोर्ट के ये आदेश तब तक लागू रहेंगे, जब तक संसद या राज्य की विधानसभाएं नया कानून न बना दें। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो महीने में कोचिंग सेंटरों के लिए नए नियम बनाने होंगे, और केंद्र सरकार को 90 दिनों में अनुपालन की रिपोर्ट देनी होगी।

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